Some Topical Poems Of Ahmad Ali Barqi Azmi डॉ. अहमद अली बर्क़ी आज़मी की कुछ सामायिक रचनाएँ /कविताएं

नया साल ख़ुशियोँ का पैग़ाम लाए
डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी
नया साल ख़ुशियोँ का पैग़ाम लाए
ख़ुशी वह जो आए तो आकर न जाए
ख़ुशी यह हर एक व्यक्ति को रास आए

मोहबब्बत के नग़मे सभी को ससुनाए
रहे जज़बए ख़ैर ख़्वाही सलामत
रहैँ साथ मिल जुल के अपने पराए

जो हैँ इन दिनोँ दूर अपने वतन से
न उनको कभी यादे ग़ुर्बत सताए

नहीँ ख़िदमते ख़ल्क़ से कुछ भी बेहतर
जहाँ जो भी है फ़र्ज़ अपना निभाए

मुहबबत की शमएँ फ़रोज़ाँ होँ हर सू
दिया अमन और सुल्ह का जगमगाए

रहेँ लोग मिल जुल के आपस मँ बर्क़ी
सभी के दिलोँ से कुदूरत मिटाए



डा. अहमद अली वर्की आज़मी की एक ग़ज़ल:






गज़ल:

नया साल है और नई यह ग़ज़ल
सभी का हो उज्जवल यह आज और कल

ग़ज़ल का है इस दौर मेँ यह मेज़ाज
है हालात पर तबसेरा बर महल

बहुत तल्ख़ है गर्दिशे रोज़गार
न फिर जाए उम्मीद पर मेरी जल

मेरी दोस्ती का जो भरते हैँ दम
छुपाए हैँ ख़ंजर वह ज़ेरे बग़ल

न हो ग़म तो क्या फिर ख़ुशी का मज़ा
मुसीबत से इंसाँ को मिलता है बल

वह आएगा उसका हूँ मैं मुंतज़िर
न जाए खुशी से मेरा दम निकल

है बेकैफ हर चीज़ उसके बग़ैर
नहीँ चैन मिलता मुझे एक पल

न समझेँ अगर ग़म को ग़म हम सभी
तो हो जाएँगी मुशकिले सारी हल

सभी को है मेरी यह शुभकामना
नया साल सबके लिए हो सफल

ख़ुदा से है बर्की मेरी यह दुआ
ज़माने से हो दूर जंगो जदल

ग़ज़ल
डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी

इतना न खींचो हो गया बस
टूट न जाए तारे नफस

थीरीँ बयानी उसकी मेरे
घोलती है कानोँ मेँ रस

खाती हैँ बल नागिन की तरह
डर है न लेँ यह ज़ुलफेँ डस

उसका मनाना मुशकिल है
होता नहीँ वह टस से मस

वादा है उसका वादए हश्र
अभी तो गुज़रे हैँ चंद बरस

फूल उन्होँ ने बाँट लिए
मुझको मिले हैँ ख़ारो ख़स

सुबह हुई अब आँखेँ खोल
सुनता नहीँ क्या बाँगे जरस

उसने ढाए इतने ज़ुल्म
मैँने कहा अब बस बस बस

बर्क़ी को है जिस से उम्मीद
उसको नहीँ आता है तरस
ग़ज़ल
डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी

जिस परी पैकर से मुझको प्यार है
वह मुसलसल दरपए आज़ार है

ख़ानए दील मेँ मकीँ है वह मेरे
फिर न जाने कैसी यह दीवार है

कर दिया है जिस ने दोनोँ को जुदा
जिस से रबते बाहमी दुशवार है

है ख़ेज़ाँ दीदह बहारे जाँफेज़ा
दूर जब से मूझसे मेरा यार है

उसके इस तर्ज़े तग़ाफ़ुल के सबब
ज़ेहन पर हर वक्त मेरे बार है

उसका तरज़े कार तो ऐसा न था
पहले था एक़रार अब इंकार है

क्या बताए अपनी बर्क़ी सरगुज़श्त
हाले दिल नाक़ाबिले इज़हार है


ग़ज़ल
डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी
हैँ किसी की यह करम फर्माइयाँ
बज रही हैँ ज़ेहन मेँ शहनाइयाँ

उसका आना एक फ़ाले नेक है
ज़िंदगी मेँ हैँ मेरी रानाइयाँ

मुर्तइश हो जाता है तारे वजूद
जिस घडी लेता है वह अंगडाइयाँ

उसकी चशमे नीलगूँ है ऐसी झील
जिसकी ला महदूद हैँ गहराइयाँ

चाहता है दिल यह उसमेँ डूब जाँए
दिलनशीँ हैँ यह ख़याल आराइयाँ

मेरे पहलू मेँ नहीँ होता वह जब
होती हैँ सब्र आज़मा तन्हाइयाँ

तल्ख़ हो जाती है मेरी ज़िंदगी
करती हैँ वहशतज़दा परछाइयाँ

इश्क़ है सूदो ज़ियाँ से बेनेयाज़
इश्क़ मे पुरकैफ हैँ रुसवाइयाँ

वलवला अंगेज़ हैँ मेरे लिए
उसकी बर्क़ी हौसला अफज़ाइयाँ

मुर्तइश. कंपित, सब्र आज़मा. नाक़ाबिले बरदाश्त
नीलगूँ , नीली सूदो ज़ियाँ . नफ़ा नुकसान


ग़ज़ल
डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी

करता रहा मैँ क़ाफिया पैमाई रात भर
बजती थी मेरे ज़ेह्न मेँ शहनाई रात भर

आई जो उसकी याद तो आती चली गई
एक लमहा मुझको नीँद नहीँ आई रात भर

बरपा था मेरे ज़ेह्न मेँ एक महशरे ख़याल
उसने बना दिया मुझे सौदाई रात भर

कितना हसीँ था उसका तसव्वुर न पूछिए
सब्र आज़मा रही मुझे तनहाई रात भर

मैँ छेडता था उसको तसव्वुर मेँ बार बार
रह रह के ले रही थी वह अंगडाई रात भर

मैँ देखता ही रह गया जब आई सामने
मुझ मेँ नहीँ थी क़ूवते गोयाई रात भर

मैँ दमबख़ुद था देख के उसका वफ़ूरे शौक़
वह मुझ को देख देख के शरमाई रात भर

बातोँ मे उसकी आगया मैँ और कहा कि जाओ
मैँ फिर मिलूँगी उसने क़सम खाई रात भर

यह जानते हुए भी कि वादा शिकन है वह
मैँ मुंतज़िर था चलती थी पुरवाई रात भर

करता रहा मैँ उसका कई दिन तक इंतेज़ार
लेकिन वह ख्वाब मेँ भी नहीँ आई रात भर

बर्क़ी नेशाते रूह था मेरा जुनूने शौक़
मैँ कर रहा था अंजुमन आराई रात भर

ग़ज़ल
डा. अहमद अली बर्की़ आज़मी

मेरी जानिब निगाहेँ उसकी की हैँ दुज़दीदह दुज़दीदह
जुनूने शौक़ मेँ दिल है मेरा शोरीदह शोरीदह

न पूछ ऐ हमनशीँ कैसे गुज़रती है शबे फ़ुर्क़त
मैँ हूँ आज़ुर्दह ख़ातिर वह भी है रंजीदह रंजीदह

गुमाँ होता है हर आहट पे मुझको उसके आने का
तसव्वुर मेँ मेरे रहता है वह ख़्वाबीदह ख़्वाबीदह

वह पहले तो न था ऐसा उसे क्या हो गया आख़िर
नज़र आता है वह अकसर मुझे संजीदह संजीदह

न पूछो मेरी इस वारफ़्तगीए शौक़ का आलम
ख़लिश दिल की मुझे कर देती है नमदीदह नमदीदह

बहुत पुरकैफ़ था उसका तसव्वुर शामे तनहाई
निगाहे शौक़ है अब मुज़तरिब नादीदह नादीदह

सफर दश्ते तमन्ना का बहुत दुशवार है बर्क़ी
पहुँच जाऊँगा मैँ लेकिन वहाँ लग़ज़ीदह लग़ज़ीदह

ग़ज़ल
डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी
सफर नया ज़िंदगी का तुमको न रास आए तो लौट आना
फेराक़ मे मेरे नीँद तुमको अगर न आए तो लौट आना
नहीँ है अब कैफ कोई बाक़ी तुम्हारे जाने से ज़िंदगी मेँ
तुम्हेँ भी रह रह के याद मेरी अगर सताए तो लौट आना
तेरे लिए मेरा दर हमेशा इसी तरह से खुला रहेगा
अगर कभी वापसी का दिल मेँ ख़याल आए तो लौट आना
बग़ैर तेरे बुझा बुझा है बहार का ख़ुशगवार मंज़र
तुझे भी यह ख़ुशगवार मंज़र अगर न भाए तो लौट आना
तुम्हारी सरगोशियाँ अभी तक वह मेरे कानोँ मेँ गूँजती हैँ
हसीन लमहा वह ज़िंदगी का जो याद आए तो लौट आना
ग़ज़ल सुनाऊँ मैँ किसको हमदम कि मेरी जाने ग़ज़ल तुम्ही हो
दोबारा वह नग़मए मोहब्बत जो याद आए तो लौट आना
ख़याल इसका नहीँ कि दुनिया हमारे बारे मेँ क्या कहेगी
जो कोई तुमसे न अपना अहदे वफ़ा निभाए तो लौट आना
है दिन मेँ बे कैफ क़लबे मुज़तर बहुत ही सब्र आज़मा हैँ रातेँ
तुम्हेँ भी ऐसे मे याद मेरी अगर सताए तो लौट आना
तुझे भी एहसास होगा कैसे शबे जुदाई गुज़र रही है
सँभालने से भी दिल जो तेरा संभल न पाए तो लौट आना
कभी न तू रह सकेगा मेरे बग़ैर बर्क़ी मुझे यक़ीँ है
ख़याल मेरा जो तेरे दिल से कभी न जाए तो लौट आना

ग़ज़ल
डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी

ख़िल उठा दिल मिसले ग़ुंचा आते ही बरखा बहार
ऐसे मेँ सब्र आज़मा है मुझको तेरा इंतेज़ार
आ गया है बारिशोँ मेँ भीग कर तुझ पर निखार
है नेहायत रूह परवर तेरी ज़ुल्फ़े मुश्कबार
जलवागाहे हुस्ने फितरत है यह दिलकश सबज़ाज़ार
सब से बढकर मेरी नज़रोँ मे है लेकिन हुस्ने यार
ज़िंदगी बे कैफ है मेरे लिए तेरे बग़ैर
गुलशने हस्ती मेँ मेरे तेरे दम से है बहार
है जुदाई का तसव्वुर ऐसे मेँ सोहाने रूह
आ भी जा जाने ग़ज़ल मौसम है बेहद साज़गार
ग़ुचा वो गुल हंस रहे हैँ रो रहा है दिल मेरा
इमतेहाँ लेती है मेरा गर्दिशे लैलो नहार
साज़े फ़ितरत पर ग़ज़लखवाँ है बहारे जाँफेज़ा
कैफो सरमस्ती से हैँ सरशार बर्क़ी बर्गो बार


1- ग़ज़ल
डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी

नहीँ है उसको मेरे रंजो ग़म का अंदाज़ा
बिखर न जाए मेरी ज़िंदगी का शीराज़ा
अमीरे शहर बनाया था जिस सितमगर को
उसी ने बंद किया मेरे घर का दरवाज़ा
सितम शआरी में उसका नहीँ कोई हमसर
सितम शआरोँ मेँ वह है बुलंद आवाज़ा
गुज़र रही है जो मुझपर किसी को क्या मालूम
जो ज़ख्म उसने दिए थे हैँ आज तक ताज़ा
गुरेज़ करते हैँ सब उसकी मेज़बानी से
भुगत रहा है वह अपने किए का ख़मयाज़ा
है तंग क़फिया इस बहर मेँ ग़ज़ल के लिए
दिखाता वरना मैँ ज़ोरे क़लम का अंदाज़ा
वह सुर्ख़रू नज़र आता है इस लिए बर्क़ी
है उसके चेहरे का ख़ूने जिगर मेरा ग़ाज़ा

अमीरे शहर-हाकिम, सितम शआरी-ज़ुल्म
सितम शआर- ज़लिम, ग़ाज़ा-क्रीम,बुलंद आवाज़ा- मशहूर


2- ग़ज़ल
डा. अहमद अली बर्की़ आज़मी

सता लेँ हमको दिलचसपी जो है उनको सताने मेँ
हमारा क्या वह हो जाएँगे रुस्वा ख़ुद ज़माने मेँ
लडाएगी मेरी तदबीर अब तक़दीर से पंजा
नतीजा चाहे जो कुछ हो मुक़ददर आज़माने मेँ
जिसे भी देखिए है गर्दिशे हालात से नालाँ
सुकूने दिल नहीँ हासिल किसी को इस ज़माने मेँ
वह गुलचीँ हो कि बिजुली सबकी आखोँ मेँ खटकते हैँ
यही दो चार तिनके जो हैँ मेरे आशयाने मेँ
है कुछ लोगोँ की ख़सलत नौए इंसाँ की दिलआज़ारी
मज़ा मिलता है उनको दूसरोँ का दिल दुखाने मेँ
अजब दसतूरे दुनियाए मोहब्बत है अरे तौबा
कोई रोने मेँ है मश़ग़ूल कोई मुसकुराने मेँ
पतिंगोँ को जला कर शमए महफिल सबको ऐ बर्क़ी
दिखाने के लिए मसरूफ है आँसू बहाने


आज ग्रसित है प्रदूषण से हमारा वर्तमान
डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी
है प्रदूषण की समस्या राष्ट्रव्यापी सावधान
कीजिए मिल जुल के जितनी जल्द हो इसका निदान
है गलोबलवार्मिंग अभिषाप अन्तर्राष्ट्रीय
इससे छुटकारे की कोशिश कार्य है सबसे महान
हो गई है अब कयोटो सन्धि बिल्कुल निष्क्रिय
ग्रीनहाउस गैस है चारोँ तरफ अब विद्यमान
आज विकसित देश क्यूँ करते नहीँ इस पर विचार
विश्व मेँ हर व्यक्ति को जीने का अवसर है समान
हर तरफ प्राकृति का प्रकोप है चिंताजनक
ले रही है वह हमारा हर क़दम पर इम्तेहान
पूरी मानवता तबाही के दहाने पर है आज
इस से व्याकुल हैँ निरन्तर बच्चे बूढे और जवान
ग्रामवासी आ रहे हैँ अब महानगरोँ की ओर
है प्रदूषण की समस्या हर जगह बर्क़ी समान

नासा का फोनिक्स स्पेस क्राफ्ट मंगल ग्रह पर
डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी
ज़ाकिर नगर , नई दिल्ली-110025
भेज कर फोनिक्स को मिर्रीख़ पर बा आबोताब
हो गया अपने मिशन मेँ आज नासा कामयाब
अब से बत्तिस साल पहले था वहाँ स्पेस क्राफ्ट
सन छिहत्तर मेँ हुई थी पहली कोशिश कामयाब
है नेहायत शादो ख़ुर्रम आज जे पी एल की टीम
है यह उसका एक मिसाली कारनामा लाजवाब
है यह तहक़ीक़े समावी का मिशन तारीख़साज़
तीसरी कोशिश हुई है आज जिसकी कामयाब
है यह सरगर्दाँ तलाश ज़िंदगी मेँ अब वहाँ
जैसे ता हद्दे नज़र सहरा मेँ हो कोई सोराब
हैँ मुसख़्खर इब्ने आदम के लिए माहो नुजूम
जिसका है क़ुरआन मेँ वाज़ह इशारा बेहिजाब
है सितारोँ से भी आगे एक जहाने बेकराँ
अहले दानिश कर रहे हैँ आज जिसको बेनिक़ाब
है यह एक अहमद अली साइंस का औजे कमाल
जिस से है बर्पा जहाँ मेँ एक ज़ेहनी इंक़े


है गलोबल वार्मिंग अहदे रवाँ मेँ एक अज़ाब
डा.अहमद अली बर्क़ी आज़मी

है गलोबल वार्मिंग अहदे रवाँ मेँ है अज़ाब
जाने कब होगा जहाँ से इस बला का सद्देबाब
ग्रीन हाउस गैस से महशर बपा है आज कल
जिस की ज़द मेँ आज है ओज़ोन का फितरी हेजाब
लर्ज़ा बर अंदाम है नौए बशर इस ख़ौफ़ से
इस कै मुसतक़बिल मेँ नकसानात होँगे बेहिसाब
हो न जाए मुंतशिर शीराज़ए हस्ती कहीँ
आई पी सी सी ने कर दी यह हक़क़त बेनेक़ाब
बाज़ आऐँगे न हम रेशादवानी से अगर
बर्फ़ के तूदे पिघलने से बढेगी सतहे आब
इस से फ़ितरत के तवाज़ुन मेँ ख़लल है नागुज़ीर 
अर्श से फरशे ज़मीँ पर होगा नाज़िल एक एताब
ज़ेह्न मे महफ़ूज़ है अब तक सुनामी का असर
साहिली मुल्कोँ मे है जिसकी वजह से इज़तेराब
ऐसा तूफ़ाने हवादिस अल अमानो अल हफ़ीज़
नौए इंसाँ खा रही है जिस से अब तक पेचो ताब
हो सका अब तक न पैमाने कयोटो का नेफ़ाज़
है ज़रूरत वक़्त की अपना करेँ सब एहतेसाब
आइए अहमद अली बर्क़ी करेँ तजदीदे अहद
हम करेँगे मिल के बर्पा एक ज़ेहनी इंक़ेलाब



है प्रदूषण की ज़रूरी रोक थाम
डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी

है प्रदूषण की ज़रूरी रोक थाम
सब का जीना कर दिया जिसने हराम
आधुनिक युग का यह एक अभिशाप है
जिस पे आवश्यक लगाना है लगाम
है कयोटो सन्धि बिल्कुल निष्क्रिय
है ज़रूरी जिसका करना एहतेराम
अब बडे शहरोँ मेँ जीना है कठिन
ज़हर का हम पी रहे हैँ एक जाम
है प्रदूषित हर जगह वातावरण
काम हो जए न हम सब का तमाम
बढ़ रहा है दिन बदिन ओज़ोन होल
है ज़ुबाँ पर हर किसी की जिसका नाम
है गलोबल वार्मिंग का सब को भय
लेती है प्राकृकि से जो इंतेक़ाम
आज मायंमार है इसका शिकार
कल न जाने हो कहाँ यह बेलगाम
इसका जारी हर जगह प्रकोप है
हो नगर अहमद अली या हो ग्राम



पर्यावरण प्रदूषण
है कहीँ बर्ड फ़्लू और कहीँ एड्स का डर
देखिए जिसको वह आता है परेशान नज़र
सभी मसरूफ है करने मेँ तजरबात नऐ
जिनका माहौल पे अब साफ नुमायाँ है असर
ऐसे अमराज़ है दरपेश नहीँ जिनका इलाज
इब्ने आदम ने जो बोया है यह है उसका समर
आब मसमूम है आलूदह फ़िजा किस से कहेँ
अहले भोपाल पे क्या गुज़री उन्हीँ को है ख़बर
हर तरफ लोग हैँ तूफ़ाने हवादिस के शिकार
साफ पानी नहीँ लोगोँ को मोयस्सर अकसर
मुर्ग़ो माही हैँ गिरिफ़्तारे अज़ीयत इस से
कारख़ानोँ की कसाफत से है जीना दो भर
उम्मुल अमराज़ है दर अस्ल यही आबो हवा
जिसमेँ रहने को हैँ मजबूर सभी शामो सहर
ताज़गी सहने गुलिस्ताँ से हुई यूँ ग़ायब
हैँ ख़ेज़ाँ दीदह सभी सर्वो समन बर्गो शजर
है यह ताक़त का नशा जिसकी बदौलत कुछ लोग
कर रहे हैँ ग़मो आलाम से भी सर्फ़े नज़र
माहो मिर्रीख़ की तसख़ीर का है उनको ख़याल
इब्ने आदम के मसायब की नहीँ उनको ख़बर
उनको मलहूज़ है हर हाल मेँ अपना ही मफ़ाद
इस लिए करते हैँ पैमाने कयोटो से मफ़र
इस मुसीबत से नहीँ अहमद अली जाए फ़रार
भाग कर जाए तो अब जाए कहाँ नौए बशर
डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी
ज़ाकिर नगर, नई दिल्ली-110025


आलूदगी मिटाएँ
डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी
ज़ाकिर नगर, नई दिल्ली-110025
मिल जुल के आइए हम ऐसी फ़ज़ा बनाएँ
आलूदगी की जुमला अक़साम को मिटाएँ
असरे जदीद की यह सब से बडी है लानत
नौए बशर को इस से हर हाल मेँ बचाएँ
है कार्बन बकसरत, महदूद आक्सीज़न
क्लोरीन के असर से मसमूम हैँ फ़ज़ाएँ
सब से बडी जहाँ मेँ नेमत है तंदुरुस्ती
हर शख़्स को तवज्जोह इस बात पर दिलाएँ
है बाइसे सआदत ख़ल्क़े ख़ुदा की ख़िदमत
अब आइए बख़ूबी इस फ़र्ज़ को निभाएँ
हो बरक़रार जिस से माहौल मेँ तवाज़ुन
हुस्ने अमल से अपने वह काम कर दिखाएँ
मद्दे नज़र हो अपने हर हाल मेँ तवाज़ुन
ताज़ा हवा मेँ धूमेँ ख़ालिस ग़ेज़ाएँ खाएँ
हर चीज़ अलग़रज़ है आलूदगी की ज़द मेँ
है फ़र्ज़े ऐन अपना इस से नजात पाएँ
एक बेहिसी सी तारी अहमद अली है सब पर
रूदादे असरे हाज़िर आख़िर किसे सुनाएँ





आधुनिक शिक्षा और हम
काल सेंटर का जिधर भी देखिए फैला है जाल
है यह सब इंफार्मेशन टेकनोलोजी का कमाल
आज कमप्यूटर पे है अहले जहँ का इंहेसार
कर रहे हैँ इस्तेफ़दा लोग इस से हस्बेहाल
सब हैँ मायल साफ़्टवेयर टेकनोलोजी की तरफ
आई टी मेँ आज है बंगलोर को हासिल कमाल
हम फ़ज़ाई टेकनोलोजी मेँ किसी से कम नहीँ
आज सेटलाइट से मुम्किन है जो था पहले मोहाल
सिलसिले इंसैट के हैँ इस हक़ीक़त के गवाह
आसमाँ पर हम बिछा सकते हैँ सेटलाइट का जाल
हिंद सदियोँ से रहा है मर्कज़े इल्मो हुनर
यह हक़ीक़त है नहीँ इसमेँ ज़रा भी एहतेमाल
होमी भाभा एस धवन और ए पी जे अब्दुल कलाम
मादरे हिंदोस्ताँ के हैँ जलीलुलक़द्र लाल
दर हक़ीक़त आलमी शोहरत के हामिल हैँ यह लोग
हैँ अज़ीमूश्शान इनके कारनामे बेमिसाल
असरे हाज़िर मेँ नई क़दरोँ को हासिल है फ़रोग़
हो रहा है दिन बदिन अक़दारे कोहना का ज़वाल
आज कल ई मेल का है बोलबाला हर तरफ़
जिस से है शर्मिंदए ताबीर हर ख़्वाबो ख़याल
है उन्हीँ को आज हर शोबे मेँ हासिल इम्तेयाज़ 
करते हैँ आइंदा नस्लोँ की जो बेहतर देख भाल
एक़तेज़ाए वक़्त है साइंस हो जुज़वे निसाब
सुरखुरू होँ ता कि पढ़ लिख कर हमारे नौनेहाल
ज़िंददी की दौड मेँ हम भी न क्योँ आगे बढेँ
लोग सरगर्मे अमल हैँ हम हैँ क्योँ आख़िर निढाल
वक़्त की है यह ज़रूरत आजकल अहमद अली
उसका मुस्तक़बिल है रोशन जिस मेँ है फ़ज़लो कमाल
डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी
ज़ाकिर नगर, नई दिल्ली-110025



तूफाने नर्गिस
आज मायंमार है तूफाने नर्गिस का शिकार
है गलोबल वार्मिंग का उसपे यह भरपूर वार
कीजिए राहे अमल मिल जुल के कोई अख़तेयार
वरना आते ही रहैँगे यह हवादिस बार बार
हो गए बरबाद लाखोँ हैँ हज़ारोँ ला पता
लौटने का लोग जिनके कर रहे हैँ इंतेज़ार
जा बजा बिखरे हुए हैँ हर तरफ लाशोँ के ढेर
बच गए हैँ जो उन्हेँ है अब मदद का इंतेज़ार
है यह फिरत के तवाज़ुन के बिगडने का अमल
आ रहा है एक तूफाने हवादिस बार बार
क्यूँ बिगडता जा रह है संतुलन परा्कृति का
लोग करते ही नहीँ इस बात पर कोई विचार
क्योँ कयोटो सन्धि पर करता नहीँ कोई अमल
इन मसायल के लिए है नैए इंसाँ ज़िम्मेदार
अब भी गर सोचा न इस आग़ाज़ के अंजाम पर
आज मायंमार है कल होगा इसका हमपे वार
पहले रीटा आया,फिर कटरीना और नर्गिस ने आज
कर दिया है दामने इंसानियत को तार तार
आज है दरकार उनको बैनुलअक़वामी मदद
जो हैँ मायंमार मेँ तूफ़ाने नर्गिस के शिकार
आज हैँ हर मुल्क को दरपेश ऐसे सानहे
पहले बंगलादेश था सैलाबो तूफ़ाँ का शिकार
हर तरह का है पलूशन बाइसे सोहाने रूह
इस से बजने की करेँ तदबीर फ़ौरन अख़तेयार
वक़्त की है ज़रूरत आज ऐ अहमद अली
रखेँ फितरत के तवाज़ुन को हमेशा बरक़रार
डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी
ज़ाकिर नगर, नई देहली-110025




है आलूदगी नौए इंसाँ की दुश्मन
डा.अहमद अली बर्क़ी आज़मी

सोलो प्वाइज़न है फ़ज़ा मेँ पलूशन
हर एक श़ख़्स पर यह हकीक़त है रोशन
युँही लोग बे मौत मरते रहैँ गे
न होगा अगर जल्द इस का सलूशन
बडे शहर हैँ ज़द मेँ आलूदगी की
जो हस्सास हैँ उनको है इससे उलझन
फ़ज़ा मेँ हैँ तहलील मस्मूम गैसेँ
है महदूद माहौल मेँ आकसीजन
जिधर देखिए कार्बन के असर से
है मायल ब पज़मुर्दगी सहने गुलशन
किसी को दमा है किसी को इलर्जी
मुकद्दर हवा से किसी को है टेंशन
जवानोँ के आसाब पर है नक़ाहत
बुज़र्गोँ की अब ज़िंदगी है अजीरन
कहाँ जाँएँ हम बच के आलूदगी से
कहीँ भी नहीँ चैन गुलशन हो या वन
कई यूनीयन कार्बाइड हैँ अब भी
जो दरपर्दा हैँ नौए इंसाँ के दुश्मन
शबो रोज़ आलूदगी बढ़ रही है
हैँ नदियाँ सरासर कसाफत का मख़्ज़न
जहाँ गर्म से गर्मतर हो रहा है
न हो जाए नौए बशर इस का ईँधन
है ओज़ोन भी ज़द मेँ आलूदगी की
जो है कुर्रए अर्ज़ पर साया अफगन
जो भरते हैँ दम रहबरी का जहाँ की
वह रहबर नहीँ दरहक़ीक़त हैँ रहज़न
कयोटो से करते हैँ ख़ुद चश्मपोशी
लगाने चले दूसरोँ पर हैँ क़दग़न
बनाते हैँ ख़ुद एटमी असलहे वह
समझते हैँ ख़ुद को मगर पाकदामन
सुनामी है उनके लिए दर्से इबरत
दिखाने चले हैँ जो फ़ितरत को दरपन
सलामत रवी का तक़ाज़ा यही है
छोडाएँ सभी इस मुसीबत से दामन
है अहमद अली वक़्त की यह ज़रूरत
बहरहाल अब सब पे नाफ़िज़ हो क़दग़न



हर कोई आलूदगी का है शिकार
डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी

आज कल माहौल है नासाज़गार
हर तरफ है एक ज़ेहनी इंतेशार
है बडे शहरोँ मेँ जीना एक अज़ाब
हर कोई आलूदगी का है शिकार
आ रहे हैँ लोग शहरोँ की तरफ
गाँव का ना गुफ़तह बेह है हाले ज़ार
नित नए अमराज़ से है साबक़ा
पुर ख़तर है गर्दिशे लैलो नहार
आ रहा है जिस तरफ भी देखिए
एक तूफ़ाने हवादिस बार बार
बढ़ती जाती है गलोबल वार्मिंग
लोग हैँ जिस के असर से बेक़रार
है दिगर्गूँ आज मौसम का मिज़ाज
गर्दिशे हालात के हैँ सब शिकार
जिसको देखो बरसरे पैकार है
दामने इंसानियत है तार तार
है गलोबल वार्मिंग अहमद अली
एक मुसलसल कर्ब की आईना दार



मीडिया
डा.अहमद अली बर्क़ी आज़मी
ज़ाकिर नगर , नई देहली

मीडिया आज रखता है सब पर नज़र
काम है इसका निष्पक्ष देना ख़बर
ध्यान रखना ज़रूरी है इस बात का
इस के कवरेज का होता है गहरा असर
शक्तिशाली है आज इस क़दर मीडिया
मोड दे क़ौमी धारे को चाहे जिधर
है यह गणतंत्र का आज चौथा सुतूँ
रखता है सब को हालात से बाख़बर
आज है दाँव पर इस की निष्पक्षता
कर लेँ क़ब्ज़ा न इस पर कहीँ अहले ज़र
जिनका मक़्सद है सिर्फ अपना ही फ़यदा
चाहते हैँ बढाना वह अपना असर
कैसे अपनी बढाएँ वह टी आर पी
सिर्फ यह बात है उनके पेशे नज़र
कैसे आगे बढेँ गे बहुत जल्द वह
संसनीख़ेज़ ख़बरेँ न देँगे अगर
शायद उनको यह आभास हरगिज़ नहीँ
झूट की ज़िंदगी है बहुत मुख़्तसर
इस पे अंकुश ज़रूरी है अहमद अली
क्योँ कि है देश की स्मिता दाँव पर



आज है इंफ़ारमेशन टेकनालोजी की बहार
डा.अहमद अली बरक़ी आज़मी,5989, ज़ाकिर नगर
नई देहली-110025

आज है इंफारमेशन टेकनालोजी की बहार
कोई गूगल पर फिदा है कोई याहू पर निसार
कोई उरदुसतानो विककीपीडिया का है असीर
है किसी को सिरफ बस चिठठाजगत का इंतेज़ार
है बलाग इसपाट का गिरवीदह कोई और कोई
कर रहा है दूसरी वेबसाइटोँ पर इंहेसार
इंडिया टाइमस हो जीमेल हो, या हाटमेल
चल रहा है आई टी से आज सब का कारोबार
आज है साइंस पर हर चीज़ का दारोमदार
अब नई क़दरँ पे है अहले जहाँ का ऐतेबार
फ़ासले सब कर दिए हैँ ख़तम अब ई मेल ने
लोग आख़िर कयोँ करेँ अब नामह बर का इंतेजार
ज़िंदगी का कोई भी शोबा नहीँ इस से अलग
आज कमपयूटर पे है सारे जहाँ का इंहेसार
हो फिज़ाई टेकनोलोजी या निज़ामे कायनात
करते हैँ मालूम इस से गरदिशे लैलो नेहार
जानते हैँ लोग इस से कया है मौसम का मिज़ाज
कयोँ फ़िज़ा मेँ उड रहे हैँ हर तरफ गरदो ग़ुबार
इसका है मरहूने मिननत आज सारा मीडिया
जितने सेटलाइट हैँ सब का है इसी पर इंहेसार
है सभी सेटलाइटोँ का इस से पैहम राबता
वरलड वाइड वेब से है यह हर किसी पर आशकार
आज के युग मेँ यह है सब के लिए बेहद मुफ़ीद
पडती है इस की ज़रूरत हर किसी को बार बार
आई टी को आप भी अपनाइए अहमद अलीआज है इस के लिए माहौल बेहद साज़गार



मुंहसिर है आज इंटरनेट पे दुनिया का निज़ाम
वकत के घोडे की है इसके ही हाथोँ मेँ लगाम
वरलड वाइड वेब मेँ सरवोततम है गूगल डाट काम
कर रहे हैँ आज सब उपयोग इसका ख़ासो आम
सब सवालोँ का तसलली बख़श देती है जवाब
इस लिए मशहूर है सारे जहाँ मेँ इसका नाम
हैँ रेडिफमेल और याहू भी नेहायत कारगर
और है चिठठाजगत का भी सभी पर फैज़े आम
है ज़ख़ीरा इलम का अनमोल विककीपीडिया
कर रहे हैँ फैज़ हासिल आज जिस से ख़ासो आम
हैँ वसीलह राबते का यह सभी वेबसाइटेँ
कर रही हैँ ख़िदमते ख़लक़े ख़ुदा जो सुबहो शाम
दूर और नज़दीक मेँ कुछ भी नहीँ है फ़ासला
चंद लमहोँ मेँ कहीँ भी भेज सकते हैँ पयाम
फारम भरना हो कोई या बुक कराना हो टिकट
आज इंटरनेट से है माक़ूल इसका इंतेज़ाम
रेडियो, अख़बार, टीवी, मीडिया अहले नज़र
इसतेफ़ादह कर रहे हैँ आज इस से ख़ासो आम
है मददगार आज यह साइंस की तहक़ीक़ मेँ
टेकनालोजी मेँ भी इस से ले रहे हैँ लोग काम
कारवाँ तहक़ीक़ का जब तक रहे गा गामज़न
काम आएगा मुसलसल इसका हुसने इंतेज़ाम
हैँ यह वेबसाइट ज़रूरत वक़त की अहमद अली
इस लिए अहले नज़र करते हैँ इनका एहतेमाम





पोलियो
पोलियो की है ज़रूरी रोक थाम
कीजिए बर वक़त इसका इंतेज़म
तंदुरुसती का है ज़ामिन यह डराप
इस लिए लाज़िम है इसका एहतेमाम
है यह बचचोँ के लिए जामे सेहत
तंदुरुसती की एलामत है यह जाम
है गर दरकार हिफ़ज़ाने सेहत
इस मिशन को कीजिए लोगोँ मेँ आम
क़ौम के मेमार हैँ बचचे यही
मुलक का जो कल सँभालेँ गे निज़ाम
है ज़रूरी इन की ज़ंहनी तरबियत
इन मेँ शायद हो कोई अबदुल कलाम
है नमूना जिस का किरदारो अमल
है ज़बाँ पर हर किसी की जिसका नाम
शायद इन मेँ कोई सर सययद भी हो
जिस का जारी आज तक है फैज़े आम
है अली गढ जिस काम मैदाने अमल
मुलक का रौशन किया है जिस ने नाम
कोई शायद हो हकीम अबदुल हमीद
जिस का है हमदरद एक नक़शे दवाम
था जो अपने आप मेँ एक अंजुमन
ख़िदमते ख़लक़े ख़ुदा था जिलका काम
जामिया हमदरद है इस का सबूत
इसतेफ़ादह कर रहे हैँ ख़ासो आम
हर कि ख़दमत करद ऊ मख़दूम शुद
ज़ात पर सादिक़ है उनकी यह कलाम
पोलियो दर असल है सोहाने रूह
इस का होगा कब न जाने एख़तेताम
हो सका इस का न अब तक सददेबाब
है यह बरक़ी एक इबरत का मोक़ाम

डा. अहमद अली बरक़ी आज़मी
598
9, ज़ाकिर नगर,नई देहली-110025




एडॅस
है जहाँ मे एक मुसलसल इज़तेराब
एडॅस का किस तरह होग सददेबाब
है यह बीमारी अभी तक ला इलाज
खा रहे हैँ लोग जिस से पेचो ताब
आज कल जो लोग हैँ इस के शिकार
ज़िंदगी है उनकी गोया एक अज़ाब
अपनी ला इलमी से अबनाए वतन
कर रहे हैँ उन से पैहम इजतेनाब
दर हक़ीक़त है यह एक मोहलिक मरज़
जिस से हैँ ख़तरात लाहक़ बे हिसाब
जिसमोँ जाँ मेँ है तवाज़ुन लाज़मी
कीजिए ऐसा तरीक़ा इंतेख़ाब
हो न पैदा इन मेँ कोई एख़तेलाल
जो भी करना है हमेँ कर लेँ शेताब
होते ही कमज़ोर जिसमानी निज़ाम
रूह मेँ होता है पैदा इज़तेराब
सलब हो जाती है क़ुवत जिसम की
देने लगते हैँ सभी आज़ा जवाब
रफता रफता आता है ऐसा ज़वाल
जिसम खो देता है अपली आबो ताब
माहरीने तिब हैँ सरगरमे अमल
ता कि इसका कर सकेँ वह सददेबाब
जिस तरह टी बी थी पहले लाइलाज
आज है उस का तदारुक दसतयाब
इस का भी मिट जऐगा नामो निशाँ
एक न एक दिन तीरगी छट जाऐगी
दूर हो जाऐगा ज़ुलमत का सहाब
कीजिए हुसने अमल अहमद अली
है ज़रूरी एक ज़ेही इंक़ेलाब



डा.आर. के. पचौरी, चेयरमैन आई पी सी सी को नोबेल पुरसकार मिलने पर
राजेनदर. के. पचौरी का बहद अहम है काम
नोबेल इनाम सुलह का है आज जिनके नाम
है एक़तेज़ाए वक़त पलूशन की रोक थाम
अहले जहाँ को आज है उनका यही पयाम
तंज़ीम उनकी रखती है माहौल पर नज़र
ख़तरे मेँ आज जिस से है यह आलमी निज़ाम
अहले जहाँ मेँ आज मुसलसल है इज़तेराब
उनकी रिपोरट जब से हुई हर किसी पे आम
मसमूम आज आबो हवा है कुछ इस तरह
सब पी रहे हैँ ज़हरे हेलाकत का एक जाम
इंसान ख़ुद है अपनी हलाकत का जिममेदार
नौएबशर से लेती है फ़ितरत यह इंतेक़ाम
कोई है क़हत और कोई सैलाब का शिकार
चारोँ तरफ है आज मसाएब का इज़देहाम
है आज सब के पेशे नज़र अपना ही मोफ़ाद
करता नहीँ है कोई कयोटो का एहतेराम
ख़ुशहाल ज़िंगदी है जो अहमद अली अज़ीज़
करना पडे गा अपनी हिफ़ज़त का इंतेज़ाम

डा. अहमद अली बरक़ी आज़मी
5989,ज़ाकिर नगर,नई देहली-110025



होमी. जे.भाभा
होमी भाभा नाज़िशे हिंदोसताँ
मुलक के भे नामवर साइंसदाँ
कियोँ न हो अहले वतन को उनपे नाज़
हमको बख़शा एक नक़शे जावदाँ
भे वह दुनियाँ भर मेँ अपने काम से
ऐटमी साइंस के रूहे रवाँ
अपने अफकारो अमल से भे सदा
मादरे हिंदोसताँ के पासबाँ
थे जो अपने काम से हर दिल अज़ीज़
हो गऐ रुख़सत वह हम से नागहाँ
उनके हैँ मरहूने मिननत अहले हिंद
जा बजा हैँ जिनकी अज़मत के निशाँ
उनकी इलमी ज़िनदगी का शाहकार
आज हर अहले नज़र पर है अयाँ
उनके ही नक़शे कदम पर आज तक
गामज़न है इलमो फ़न का कारवाँ
हो रहे हैँ लोग जिस से मुसतफीद
पहले था वह ख़ारिज अज़ वहमों गुमाँ
जिनके थे असलाफ फख़रे रोज़गार
गरदिशे दौराँ उनहैँ लाई कहाँ
पहले हम थे जिनके मंज़ूरे नज़र
ले रहे हैँ वह हमारा इमतेहाँ
उनका फ़ैज़ाने नज़र अहमद अली
इलम का है एक गंजे शायगाँ



सुनिता विलियम
सुनिता विलियम के ख़लाई तजरबे का मरहलह
और फिर नासा से उसकाएक मुसलसल राबतह
असरे हाज़िर में है यह साईंस का औजे कमाल
मुददतों करते रहैंगे लोग जिसका तज़करह
कुछ भी नामुमकिन नहीं है हो अगर अज़मे सफर
दरसे इबरत है हमारे वासते यह वाक़ेयह
जिन में है ज़ौके तजससुस और असरी आगही
उनका है शामो सहर तहकी़क फितरी मशग़लह
नौ दिसमंबर को रवानह वह हुई सूऐ फ़लक
लायक़े तहसीं है यह अज़मे सफर यह हौसलह
थी फ़ज़ा में नौ महीने तक वह सरगरमे अमल
कारनामह उसका यह है आज तक बेसाबक़ह
एक ज़ररीं बाब है तारीख़ का तेईस जून
कामयाबी से हुआ तकमील जब यह मरहलह
होंगे फितरत के बहुत से राज़ हम पर मुनकशिफ
अहले दानिश जब करेंगे इसका इलमी तजज़ियह
आ गया अटलांटिस ले कर ख़लाबाजोँ को साथ
अब मिले गा उनको उनकी कामयाबी का सिलह
अहदे हाज़िर मेँ है अब साइँस बेहद सूद मंद
आइऐ मिल जुल के हम भी यह करें अब फैसलह
हम भी अपनाँऐँगे इस को अहले मग़रिब की तरह
रुक नहीँ सकता कभी तहक़ीक़ का यह सिलसिलह
अहले मशरिक़ इलमोँ दाँनिश मेँ किसी से कम नहीँ
कमयाबी से किया सुनिता ने तै यह मरहलहदर हक़ीक़त है यह बरक़ी एक मिशन तारीख़साज़
सुनिता विलियम का सफर साँइंस का है मोजज़ह
डा. अहमद अली बरक़ी आज़मी, ज़ाकिर नगर, नई दिलली- 110025




कलपना चावला
हिंद की शान थी कलपना चावला
क़ाबिले क़द् जिसका रहा हौसला
जब ख़लाई मिशन पर रवाना हुई
तै किय़ा कामय़ाबी से हर मरहला
कर के अससी से ज़यादह अहम तजरबे
सात साइ़ंसदानो़ का यह क़ाफिला
जब ख़लासे ज़मीं पर रवाना हुआ
लौटते वक़त पेश आगया हादसा
जान दे करख़ला मे़ अमर हौ गई
है यह तारीख़ का एक अहम वाके़या
थी यकुम फिरवरी जब वह रुख़सत हुई
था क़ज़ा वो क़दर कायही फैसला
जब मनाते है़ सब लोग साइंस डे
पेश आया उसी माह यह हादसा
अहले करनाल तनहा न थे दमबखुद
जिस किसी ने सुना था वही ग़मज़दह
इस से मिलती है तहरीके म़ंज़िल रसी
है नहीं रायगां कोई भी सानेहा
कामयाबी की है शरते अववल यही
हो कभी कम न इ़ंसान का वलवलह
जाऐ पैदाइश उसकी थी जिस गांव में
पूछते हैं सभी लोग उसका पताता
तुम भी पड लिख के अब नाम रौशन करो
तै करो कामयाबी से हर मरहलह
सारी दुनिंयां में रहते हैं वह सुरखु़रू
आगे बङने का रखते हैं जो हौसला
कयंु नहीं हम को रग़बत है साइंस से
है हमारे लिए लमहए फिकरियह
ग़ौर और फिकर फितरत के असरार पर
है यही अहले साइंस का मशग़लह
माहो मिररीख़ जब तक है़ जलवा फेगन
ख़तम होगा न तहकीक़ का सिलसिला
आइए हम भी अपनांएं साइंस को
आज जो कुछ है सब है इसी का सिला
वक़त की यह ज़रूरत है अहमद अली
कर दिया ख़तम जिसने हर एक फासलह






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